बौद्ध परिपथ

उत्तर प्रदेश वह भूमि है जहां हजारों साल पहले गौतम बुद्ध ने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा बिताया था। यह वह जगह है जहां भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया, अपने संदेश को फैलाने के लिए व्यापक रूप से यात्रा की और अंत में महापरिनिर्वाण को प्राप्त किया। इस प्रकार शब्द ‘बौद्ध परिपथ’ सामने आया। इस परिपथ में भव्य स्तूप और प्राचीन मठ हैं जहाँ बौद्ध मंत्रों के गुंजन को महसूस किया जा सकता है।आप कई बौद्ध तीर्थयात्रियों और भिक्षुओं को देख सकते हैं जो पूरे साल ध्यान और पूजा के लिए यहाँ आते हैं। बौद्ध क्षेत्र में 5 स्थानों का समावेश है जो बौद्ध धर्म के प्रति प्रमुख महत्व रखते हैं। यहाँ कपिलवस्तु में राजकुमार सिद्धार्थ ने बाल्यावस्था से गृहस्थ होने तक का समय तय किया था। सारनाथ में उन्होंने अपना पहला सार्वजनिक प्रवचन दिया, कौशांबी में उन्होंने अपने कई उपदेश दिए, फिर श्रावस्ती उनका पसंदीदा वर्षा ऋतु में रुकने का स्थल रहा है, कुशीनगर में उन्होंने महापरिनिर्वाण प्राप्त किया और संकिसा में अपनी माँ को स्वर्ग से संबोधित करने के बाद अवतीर्ण हुए। भगवान बुद्ध के जीवन की जानकारी प्राप्त करने के लिए इन सभी स्थानों पर जाना चाहिए।

कपिलवस्तु

यह शहर ताकतवर शाक्य वंश की राजधानी थी। यहाँ राजकुमार सिद्धार्थ (बाद में भगवान बुद्ध) ने अपने बचपन का अधिकांश भाग बिताया था। कपिलवस्तु बुद्ध के पिता राजा शुद्धोधन का सिंहासन भी था। यहाँ कई खुदाई स्थल हैं। कपिलवस्तु में घूमते हुए आप हजारों साल पहले के युग में स्वयं को स्थानान्तरित अनुभव करेंगे जब युवराज सिद्धार्थ जीवन के दु:खों को देखने के बाद, तमाम धन-दौलत और सुखों को त्याग कर मोक्ष के मार्ग की तलाश में निकल पड़े थे।

कौशाम्बी

यह जगह इलाहाबाद से 60 किलोमीटर दूर है। ऐसा माना जाता है कि यहाँ भगवान बुद्ध ने कई उपदेश दिए थे, जो इसे बौद्धों के लिए उच्च शिक्षा का केंद्र बनाते हैं। यह उन समय के सबसे समृद्ध शहरों में से एक माना जाता है। उत्खनन से बड़ी संख्या में प्रतिमाएं, मूर्तियाँ, साँचे में ढले सिक्के और मृदा की वस्तुए मिली है। इसके अलावा एक अशोकीय स्तंभ, एक पुराना किला और घोषिताराम मठ प्राप्त हुआ है।

संकिसा

यह कहा गया है कि संकिसा वह जगह है जहाँ भगवान बुद्ध अपनी माँ को स्वर्ग में एक धर्मोपदेश देने के बाद अवतीर्ण हुए और सम्राट अशोक ने इस पवित्र स्थान के लिए एक हाथी की प्रतिमा के साथ एक स्तंभ खड़ा किया। यह हाथी उस सफेद हाथी का प्रतिनिधित्व करता है, जिसे भगवान बुद्ध की माँ ने सिद्धार्थ के गर्भाधान के समय स्वप्न में देखा था। फ़रुखाबाद जिले में काली नदी के किनारे बसंतपुर गांव के रूप में इस स्थान की पहचान की गई है।

श्रावस्ती

बहराइच से लगभग 15 किलोमीटर दूर श्रावस्ती शहर है और इसने भगवान बुद्ध की 27 वर्ष मेजबानी की थी क्योंकि यह उनका वार्षिक वर्षाऋतु में आश्रयस्थल था। कहा जाता है कि यह जगह राजा श्रावस्त द्वारा स्थापित की गई है। इस जगह में कई अच्छी तरह से संरक्षित स्तूप, मठ और सुंदर मंदिर हैं। श्रावस्ती के पास एक आनंद बोधी वृक्ष भी है जो कि मूल बोधी वृक्ष का वंश है, यह भगवान बुद्ध के मुख्य शिष्य द्वारा लगाया गया था।

कुशीनगर

कुशीनगर शहर गोरखपुर से 50 किमी दूर है जहां भगवान बुद्ध ने महापरिनिर्वाण प्राप्त किया था। इस जगह पर एक विशिष्ट रूप से कलाकृत किया गया महापरिनिर्वाण मंदिर है जिसमें बुद्ध की एक विशाल मूर्ति है। यह 1879 में खुदाई में प्राप्त हुआ था। यहाँ भगवान बुद्ध ने अपना अंतिम धर्मोपदेश दिया था। उत्खनन से यहां 11वीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक रहने वाले भिक्षुओं के एक बड़े समुदाय की मौजूदगी का पता चला है।

सारनाथ

सारनाथ वाराणसी से 10 किमी दूर है, जहां 2500 से ज्यादा साल पहले भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त करने के बाद अपना पहला धर्मोपदेश दिया था। इस जगह में कई ऐतिहासिक स्थल जैसे धामेक स्तूप हैं, जिसे "भगवान बुद्ध का आसन" के नाम से जाना जाता है। यहाँ से उन्होंने अपनी शिक्षाएँ दी थीं। मूलगंध कुटी विहार, चौखंडी स्तूप और धर्मराजिका स्तूप आदि हैं। सम्राट अशोक द्वारा ईसा पूर्व 273-232 में स्थापित किया गया एक स्तंभ भी है, जो बौद्ध संघ की नींव था। इस स्तंभ के शीर्ष पर सिंहस्तम्भ है, जो अब भारत का राष्ट्रीय...

शंसापत्र